Monday, April 21, 2014

Jagannath Mandir Puri

पुरी में जगन्नाथ मंदिर केे कुछ आश्चर्यजनक तथ्य:-
1. मन्दिर के ऊपर स्थापित ध्वज सदैव हवा के विपरीत दिशा में लहराता है।
2. पुरी में किसी भी स्थान से आप मन्दिर के ऊपर लगे सुदर्शन चक्र को देखेंगे तो वह आपको सदैव अपने सामने ही लगा दिखेगा।
3. सामान्य दिनों के समय हवा समुद्र से जमीन की तरफ आती है, और शाम के दौरान इसके विपरीत, लेकिन पुरी में इसका उल्टा होता है ।
4. पक्षी या विमानों को मंदिर के ऊपर उड़ते हुए नहीं पायेगें।
5. मुख्य गुंबद की छाया दिन के किसी भी समय अदृश्य ही रहती है ।
6. मंदिर के अंदर पकाने के लिए भोजन की मात्रा पूरे वर्ष के लिए रहती है। प्रसाद की एक भी मात्रा कभी भी व्यर्थ नहीं जाती, चाहे हजार लोगों से 20 लाख लोगों को खिला सकते हैं ।
7. मंदिर की रसोई में प्रसाद पकाने के लिए 7 बर्तन एक-दूसरे पर रखा जाता है और सब कुछ लकड़ी पर ही पकाया जाता है । इस प्रक्रिया में शीर्ष बर्तन में सामग्री पहले पकती है फिर क्रमश: नीचे की तरफ एक के बाद एक पकती जाती है।
8. मन्दिर के सिंहद्वार में पहला कदम प्रवेश करने पर ही (मंदिर के अंदर से) आप सागर द्वारा निर्मित किसी भी ध्वनि नहीं सुन सकते, आप (मंदिर के बाहर से) एक ही कदम को पार करें जब आप इसे सुन सकते हैं, इसे शाम को स्पष्ट रूप से अनुभव किया जा सकता है।
साथ में यह भी जाने:-
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मन्दिर का रसोईघर दुनिया का सबसे बड़ा रसोईघर है।
प्रति दिन सांयकाल मन्दिर के ऊपर स्थापित ध्वज को मानव द्वारा उल्टा चढ़ कर बदला जाता है।
मन्दिर का क्षेत्रफल चार लाख वर्ग फिट में है।
मन्दिर की ऊंचाई 214 फिट है।
विशाल रसोई घर में भगवान जगन्नाथ को चढ़ाने वाले महाप्रसाद का निर्माण करने हेतु 500 रसोईये एवं उनके 300 सहायक-सहयोगी एक साथ काम करते है। सारा खाना मिट्टी के बर्तनो मे पकाया जाता है !
हमारे पूर्वज कितने बढे इंजीनियर रहें होंगे
अपनी भाषा अपनी संस्कृति अपनी सभ्यता पर गर्व करो
गर्व से कहो हम हिन्दु है
ॐ ॐ

Real Meaning of ShivLing

हिन्दुओ शिवलिंग का असली अर्थ जानिये :
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कुछ लोग शिवलिंग की पूजा की आलोचना करते है..
छोटे छोटे बच्चो को बताते है कि हिन्दू लोग लिंग और योनी की पूजा करते है..बेवकुफो को संस्कृत का ज्ञान नहीं होता है..और छोटे छोटे बच्चो को हिन्दुओ के प्रति नफ़रत पैदा करके उनको आतंकी बना देते है...अब मै इसका अर्थ बता रहा हूँ..

लिंग>>>
लिंग का संस्कृत में चिन्ह ,प्रतीक अर्थ होता है...
जबकी जनर्नेद्रीय को संस्कृत मे शिशिन कहा जाता है..

शिवलिंग >>>
शिवलिंग का अर्थ शिव का प्रतीक....

>>पुरुषलिंग का अर्थ पुरुष का प्रतीक इसी प्रकार स्त्रीलिंग का अर्थ स्त्री का प्रतीक और नपुंसकलिंग का अर्थ है ..नपुंसक का प्रतीक ----

अब यदि जो लोग पुरुष लिंग को मनुष्य के जनेन्द्रिय समझ कर आलोचना करते है..तो वे बताये ''स्त्री लिंग '''के अर्थ के अनुसार स्त्री का लिंग होना चाहिए...और खुद अपनी औरतो के लिंग को बताये फिर आलोचना करे----

''शिवलिंग'''क्या है >>>>>
शून्य, आकाश, अनन्त, ब्रह्माण्ड और निराकार परमपुरुष का प्रतीक होने से इसे लिंग कहा गया है। स्कन्दपुराण में कहा है कि आकाश स्वयं लिंग है।शिवलिंग वातावरण सहित घूमती धरती तथा सारे अनन्त ब्रह्माण्ड ( क्योंकि, ब्रह्माण्ड गतिमान है ) का अक्स/धुरी (axis) ही लिंग है।
शिव लिंग का अर्थ अनन्त भी होता है अर्थात जिसका कोई अन्त नहीं है नाही शुरुवात |

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शिवलिंग का अर्थ लिंग या योनी नहीं होता ..दरअसल ये गलतफहमी भाषा के रूपांतरण और मलेच्छों द्वारा हमारे पुरातन धर्म ग्रंथों को नष्ट कर दिए जाने तथा अंग्रेजों द्वारा इसकी व्याख्या से उत्पन्न हुआ हो सकता है|

खैर…..
जैसा कि हम सभी जानते है कि एक ही शब्द के विभिन्न भाषाओँ में अलग-अलग अर्थ निकलते हैं|
उदाहरण के लिए………
यदि हम हिंदी के एक शब्द “सूत्र” को ही ले लें तो…….
सूत्र मतलब डोरी/धागा गणितीय सूत्र कोई भाष्य अथवा लेखन भी हो सकता है| जैसे कि नासदीय सूत्र ब्रह्म सूत्र इत्यादि |
उसी प्रकार “अर्थ” शब्द का भावार्थ : सम्पति भी हो सकता है और मतलब (मीनिंग) भी |

ठीक बिल्कुल उसी प्रकार शिवलिंग के सन्दर्भ में लिंग शब्द से अभिप्राय चिह्न, निशानी, गुण, व्यवहार या प्रतीक है।धरती उसका पीठ या आधार है और सब अनन्त शून्य से पैदा हो उसी में लय होने के कारण इसे लिंग कहा है तथा कई अन्य नामो से भी संबोधित किया गया है जैसे : प्रकाश स्तंभ/लिंग, अग्नि स्तंभ/लिंग, उर्जा स्तंभ/लिंग, ब्रह्माण्डीय स्तंभ/लिंग (cosmic pillar/lingam)
ब्रह्माण्ड में दो ही चीजे है : ऊर्जा और प्रदार्थ | हमारा शरीर प्रदार्थ से निर्मित है और आत्मा ऊर्जा है|
इसी प्रकार शिव पदार्थ और शक्ति ऊर्जा का प्रतीक बन कर शिवलिंग कहलाते है |
ब्रह्मांड में उपस्थित समस्त ठोस तथा उर्जा शिवलिंग में निहित है. वास्तव में शिवलिंग हमारे ब्रह्मांड की आकृति है. (The universe is a sign of Shiva Lingam.)
शिवलिंग भगवान शिव और देवी शक्ति (पार्वती) का आदि-आनादी एकल रूप है तथा पुरुष और प्रकृति की समानता का प्रतिक भी अर्थात इस संसार में न केवल पुरुष का और न केवल प्रकृति (स्त्री) का वर्चस्व है अर्थात दोनों सामान है

अब बात करते है योनि शब्द पर ----
मनुष्ययोनि ''पशुयोनी''पेड़-पौधों की योनि'''पत्थरयोनि''' >>>>
योनि का संस्कृत में प्रादुर्भाव ,प्रकटीकरण अर्थ होता है..जीव अपने कर्म के अनुसार विभिन्न योनियों में जन्म लेता है..कुछ धर्म में पुर्जन्म की मान्यता नहीं है ..इसीलिए योनि शब्द के संस्कृत अर्थ को नहीं जानते है जबकी हिंदू धर्म मे ८४ लाख योनी यानी ८४ लाख प्रकार के जन्म है अब तो वैज्ञानिको ने भी मान लिया है कि धरती मे ८४ लाख प्रकार के जीव (पेड, कीट,जानवर,मनुष्य आदि) है....
मनुष्य योनी >>>>पुरुष और स्त्री दोनों को मिलाकर मनुष्य योनि होता है..अकेले स्त्री या अकेले पुरुष के लिए मनुष्य योनि शब्द का प्रयोग संस्कृत में नहीं होता है...





हिन्दू एक हो एक हो ..
और कोई हमारे धर्म को गलत न कहे
इशिलिये ऐशा ज्ञान जरुर ले और दुसरो को भी दे ..

हर हर महादेव...

Tuesday, July 9, 2013

Fastival at Karanwas



परम्परागत आयोजन :- सिद्ध शक्ति पीठ होने के नाते यहाँ अति प्राचीन काल से कुछ उत्सव एवं परम्परागत आयोजन विशेष रूप से आयोजित किये जाते है |उनमें से बहुत से आयोजन समय के प्रभाव मैं लुप्त हो गए है |किन्तु परम्परागत उत्सवो का आयोजन आज भी होता है |इन्ही आयोजनों  से इस पवित्र सिद्ध भूमि की धार्मिक एवं सामाजिक संस्क्रती सुरक्षित है वर्तमान मैं निम्नलिखित आयोजन आयोजित होते है |
श्री रामनवमी उत्सव :- चैत्रशुक्ला नवमी को यह उत्सव यहाँ के ध्र्मिक्जानो द्वार बड़े उल्लास से मनाया जाता है मंदिर आश्रमों मैं भजन कीर्तन सत्संग आदि के विशेष आयोजन होते है दोपहर से शाम के बीच श्री राम जी का डोला बड़ी धूम धाम से निकला जाता है भजन कीर्तन करते भक्तजन डोला लेकर गंगा तट पर पहुचते है वही श्री राम जी को गंगा स्नान कार्य जाता है भोग लगाया जाता है प्रशाद वितरित करके बाद मैं श्री राम जी मूर्ति को मंदिर ले जाकर प्रतिष्ठित करते है |
अन्नकूट:- दीपावली के अवसर पर यहाँ के लाक्स्मिनारायण मंदिर मैं अन्नकूट उत्सव का आयोजन होता है इस अवसर पर श्री लाक्स्मिनारायण जी को ५६ प्रकार के पकवानों का भोग लगाया जाता है बाद मैं विशाल भंडारे का आयोजन होता है यहाँ के बच्चे भी इस उत्सव की प्रतिच्छा करते है |
श्री गंगा जी जन्मोत्सव :-
ऐसी पुराणिक मान्यता है की इस धरा धाम पर श्री गंगा जी का अवतरण वैशाख शुक्ला दशमी को हुआ था | अत:  यहाँ के लोग इस दिन श्री गंगा जी का विशेष पूजन अर्चन करते है | सायं काल मैं श्री गंगा जी की प्रतिमा को सिंहासनासीन करके भजन कीर्तन करते हुए जुलूस निकला जाता है | गंगा तट पर पहुच कर वेद पाठी ब्राह्मणों द्वार श्री गंगा जी की विधिवत स्नान पूजन अर्चन , आरती , भजन कीर्तन आदि होता है |प्रसाद वितरण के बाद उत्सव का विसर्जन होता है |         


हिंडोला उत्सव :- श्रावण शुक्ला एकादसी को यहाँ के प्रसिद्ध मंदिर लक्ष्मीनारायण जी के मंदिर मैं हिंडोला उत्सव का भव्य आयोजन होता है| हिंडोला डालकर उस पर श्री विग्रह को प्रतिष्ठीत कर झुलाया जाता है श्री लक्ष्मीनारायण जी के श्री विग्रह का विशेष श्रंगार किया जाता है अन्य अनेक मुर्तिया की आकर्षक झाकिया भी सत्संग भवन मैं सजाई जाती है | दर्शनथियो की इस दिन विशेष भीड़ रहती है | यह कार्यक्रम पूर्णिमा तक निरन्तर प्रतिदिन नए और आकर्षक रूप मैं आयोजित होता है | यहाँ के हिंडोले भी वृन्दावन के हिंडोलो की याद दिलाते है | 


श्रावणी :- श्रावणी मुखयत: ब्राह्मणों का उत्सव है | किन्तु इस मैं यज्ञो पवित धरी वैश्य और क्षत्रिय भी सम्मलित होते है | यह उत्सव करनवास मैं विशेष रूप से आयोजित होता है | श्रावण पूर्दिमा के दिन प्रात: काल धर्मनिष्ठ द्विजातिय श्री गंगा तट पर एकत्रित होते है | यहाँ शास्त्र विधि अनुसार विद्वान् वेद पाठी द्वारा मंत्रौच्चार पूर्वक सामूहिक रूप से पञ्च गव्य्पन, पञ्चस्नान, तर्पण, प्रायश्चित आदि करते है| यह कार्यक्रम २ बजे अपराह् तक चलता है बाद मैं देव ऋषि पूजन यज्ञोपवीत पूजन आदि कृत्य होते है वास्तव मैं प्रत्येक दिजतीय को इस उत्सव मैं सम्मलित होने का सोभाग्य प्राप्त करना चाहिये |

श्री गंगा दशहरा – ज्येष्ठ शुक्ला दसमी के अवसर पर  अति प्राचीन काल से करनवास में विशाल मेला लगता है | आज भी अनेक विशेषताओ के लिए आज भी यह मेला दूर दूर तक विख्यात है | दूर दूर के दुकानदार सर्कस झूले तमाशे यहाँ आते है काठ का सामान, संदूक की दुकाने यहाँ लगती है | इस पवित्र अवसर पर श्रद्धालु यहाँ आअकर अपने बच्चो का मुंडन संकार करते है अवं कथा हवं अवं भंडारा करके पुण्य अर्जित करते है | मेला बड़ा ही व्यवस्थित लगता है यह कई दिनों तक चलता है | यात्रियों के ठहरने की पूरी व्यवस्था होती है एवं प्रशासन द्वारा इस मेले में पुलिश बल की तैनाती की जाती है बच्चो के ख़जाने पर यहाँ पर कैंप लगते है जिससे बच्चो की सुरक्षा रहे इस मेले के अवसर पर श्री गंगा जी के घाट पर लोगो को गंगा जी में डूबने से बचने के लिए गाव के प्रसिद्ध मल्लाह श्री मोती लाल जी का विशेष योगदान रहा है अवं इनके सुपुत्र गंगा राम आज भी इस सेवा में तत्पर रहते है |
   
राम लाला की सवारी :- आषाढ़ शुक्ला द्वतीय को यहाँ के समस्त गाँव वासी और आस पास के क्षेत्र के लोग श्री राम लाला की झांकी (राम बारात) निकलते है | कर्ण क्षेत्र का यह विशाल आयोजन प्राचीन काल से होता हुआ आ रहा है | श्री राम लाला जी को सुन्दर सिंहासन पर प्रतिष्ठित कर एक धातु जटित बग्गी पर रख कर लोग झांकी बड़ी धूमधाम से माँ कल्याणी के मंदिर से निकालते है | भजन कीर्तन करते हुए लोग जगन्नाथ, वृन्दावन की भांति रथ में स्वर राम लाला की सवारी को श्रद्धा से खीचते हुए, भगवन की जय जय कार करते हुए चलते है | मेरे प्रभू श्री राम की इस बारात में हाथी घोड़ो बैंड बाजो से बड़े ही हर्ष उल्लास के साथ निकालते है | प्रभु श्री राम की इस बारात में गाँव के लोग तरह तरह की झाँकियो के साथ भी सम्मिलित होते है |  यह बारात श्री गौरव  कुमार सोंठीया जी के घर से गुजरते हुए तिराए से होकर आदित्य गौड (अंकुर पंडित) के घर के सामने व पूरे गाँव से होकर पकके घाट पे माँ गंगा जी की अर्चना करते हुए राम लीला मेदान पहुचती है और रात्रि काल में सब श्रधालुओ के लिए भोजन की व्यवस्था की जाती है जिसमे तरह तरह की मिठाईया ,पकवान परोसे जाते है | समस्त श्रद्धुलुओ को इस अवसर का पूरे साल इंतजार रहता है |  
 

Monday, July 8, 2013

Tapo Bhumi Karanwas

सिद्धसंत परम्परा :-
सिद्ध स्थान होने के कारण अति प्राचीन काल से करनवास संत महात्माओ सन्यासियों की तापोस्थली रहा है | इस सिद्ध क्षेत्रान्त्ग्रत निवास करने वाले सभी प्राणी रहस्य मय है | चिरंजीवी एवं योगीजन यहाँ शारीर परिवर्तन करके आज भी निवास करते है | उनेह जो जनता है| वही पहचानता है सिद्ध संत महात्माओ की यहाँ सुदिर्ग परम्परा रही है| अनेक सिद्ध संतो के नाम काल के गर्त मैं विलीन हो गए है | किन्तु श्रुति प्रमाण परम्परा से प्राप्त अनेक महात्माओ के नाम है | जो की निकट अतीत और वर्तमान के जाज्जवल्य्मान संत रहे है | ऐसे संतो मैं कुछ नाम इस प्रकार है |

महात्मा गौतमबुद्ध :-
 भव्य राजमहल,  सुन्दर रानी, कुलदीप पुत्र और विरक्त हो कर ज्ञान प्राप्ति के लिए भ्रमण करते हुए महात्मा गौतम बुद्ध इस क्षेत्र मैं भी आये थे | यही बुधू नाम से प्रसिद्ध स्थान पर प्राचीन स्थान मैं माता का मंदिर था जो आज भी है |यही रहकर उनोहने काफी समय तक तप किया था| लोगो का मनना है की आज भी तमाल का वह सघन का वृक्ष उसी स्थति मैं आज भी है जहाँ पर महात्मा बैठ कर तपस्या किया करते थे |महात्मा बुद्ध के नाम वर्तमान स्थित बुधू माता का मंदिर आज भी प्रसिद्ध है |
सिद्ध बाबा :-
करणवश के प्राचीन संतो मैं सिद्ध बाबा थे |इसी नाम से विख्यात इन संतो को करणवश की झाड़ियो मैं तपस्या करके ही सीधी प्राप्त हुई थी |कहा जाता है कि मुगाल्शासन काल मैं जब संत महात्माओ को उत्पीडन देने के लिए कारगर मैं बंद किया गया तो सिद्ध बाबा को भी जाना पड़ा कारगर मैं संतो को चक्की चलने का आदेश दिया गया | सभी महात्माओ के सामने अत पीसनी चक्की रखदी गयी और उनसे कहा चक्की चलाओ नहीं तो कोड़े पड़ेंगे | सिद्ध बाबा ने चक्की के तरफ ऊँगली से इशारा करते हुए कहा चक्की चल बाबा के कहते ही चक्की अपने आप चल पड़ी और फिर सभी महात्माओ के सामने की साडी चक्की क्रमशः अपने आप तेजी से घुमने लगी | प्रत्येक महात्मा को जो अन्न दिया था वो सारा पिस गया किन्तु चक्की चलना बंद नहीं हुई |चक्की घुमती रही |इस चमत्कार से काराग्रह के सभी कर्मचारी हैरान थे उन्होंने जेक मुग़ल सम्राट को बताया |सुनकर मुग़ल बादशाह वहा आया और उसने बाबा से छमा मागते हुए चक्की बंद करने की प्रार्थना की | तब बाबा ने चक्की बंद की और कहाँ की मेरी तरह ही ये सारे महात्मा शक्तिमान है किन्तु यह अपनी ताप शक्ति छीड नहीं करना चाहते |मेरे साथ इन सभी महात्माओ को भी रिहा करो |बाद मैं गंगा तट पर विचरण करते हुए उन्होंने अनूपशहर से छ कोस उपर अपना शारीर त्याग दिया |आज भी वह सिद्ध बाबा की समाधी है |और यहाँ पर लोग जाकर सिद्ध बाबा की समाधी के दर्शन करते है|

Sunday, June 16, 2013

Shri Ganga Mandir Karanwas

श्री गंगा मंदिर :- यह मंदिर माँ कल्याणी वाले तिराहे के निकट स्थित है कर्णवास के परम्परागत उत्सवो मैं श्री रामलला की सवारी रथयात्रा यही से प्रराम्भ होती है मंदिर मैं श्री गंगा जी की भव्य प्रतिमा है । यहाँ भी नित्य पूजा के अतिरिक्त वर्ष के सभी उत्सव उल्लास पूर्वक आयोजित होते है । वर्तमान में इस मंदिर की जिम्मेदारी स्वामी अशोक जी महाराज के हाथो में है । वो यहाँ रहकर मंदिर की सम्पूर्ण व्यवस्था सम्हालते है एवं माँ गंगा की भक्ति में लीन रहते है ।   



Ganga Mandir



Maa Ganga Mandir

Maa Ganga